रविवार, 1 नवंबर 2020

भ्रूण हत्या

अभी तो माँ के गर्भ में ही थी

सोच रही थी कभी तो बाहर आउंगी

आकर फिर जीवन के रंगों को देखूंगी

कभी माँ की तरह खुल कर हंसूंगी

कभी जी भर कर आंसू बहाऊँगी,

पर ऐसा क्या किया मैंने

कि मेरे बिना किसी गलती के

सब मुझसे छुटकारा पाने की सोचने लगे;

मुझे मेरी लड़की होने पर कोसने लगे;

अभी तो मुंह भी नहीं खोला था

पर मेरी चीख उन्हें परेशान करने लगी,

मेरी ज़िंदगी के खर्चे वो गिनने लगे,

मुझ पराया धन को धिक्कारने लगे;

मेरे चिथड़े हो जाने के डर से

उन सबने मेरे चीथड़े कर डाले,

मैं वो अजन्मी बेटी हूँ

जिसे मेरे घरवालों ने

गर्भ में ही मसल डाले।


अनुपम मिश्र 


अभ्युदय

अभ्युदय है दिप्त प्रकाश का छाव सा है वृहत आकाश का, ओज़ पूर्ण है सौम्य आवाज जिसका, अचल शिखर सा है मिजाज़ जिसका, रास्ता वो स्वयं अपना बनाता है...