अभी तो माँ के गर्भ में ही थी
सोच रही थी कभी तो बाहर आउंगी
आकर फिर जीवन के रंगों को देखूंगी
कभी माँ की तरह खुल कर हंसूंगी
कभी जी भर कर आंसू बहाऊँगी,
पर ऐसा क्या किया मैंने
कि मेरे बिना किसी गलती के
सब मुझसे छुटकारा पाने की सोचने लगे;
मुझे मेरी लड़की होने पर कोसने लगे;
अभी तो मुंह भी नहीं खोला था
पर मेरी चीख उन्हें परेशान करने लगी,
मेरी ज़िंदगी के खर्चे वो गिनने लगे,
मुझ पराया धन को धिक्कारने लगे;
मेरे चिथड़े हो जाने के डर से
उन सबने मेरे चीथड़े कर डाले,
मैं वो अजन्मी बेटी हूँ
जिसे मेरे घरवालों ने
गर्भ में ही मसल डाले।
अनुपम मिश्र