अभ्युदय है दिप्त प्रकाश का
छाव सा है वृहत आकाश का,
ओज़ पूर्ण है सौम्य आवाज जिसका,
अचल शिखर सा है मिजाज़ जिसका,
रास्ता वो स्वयं अपना बनाता है,
धीरज से हर प्रहार का उत्तर देता है!
बिछा जाए जो कोई नुकीला शूल या नरम फूल,
ये ना डरते हैं ना रुकते है पाकर सब अनुकूल,
विकास के पथ पर पग बढ़ाते हुए समयानुकूल,
ये दोनों हाथों से करते हैं हर स्थिति को कुबूल,
धूल का कण कण इनका साथ निभाता है,
रूपरेखा इनके सपनों की वही बनाता बिगाड़ता है।
ज्ञान की कहां कोई सीमा होती है यहां
हैं असल ज्ञानी वो, जो जानते सब की जुबां,
जो सुनते स्वरों को बिन बदले उनका निशान,
जो कहते कुछ नहीं पर मौन में दिखा जाते जहां,
अक्श इनका हर सख्श के मन को लुभाता है,
इनका मन भी भंवरे की भाति हर रस को चखता है।
हां, ये भी कोई आम सख्श ही है
बस इसकी सोच सामान्य नहीं है
क्योंकि ये स्वयं को भी स्पष्ट नहीं है।
©अनुपम मिश्र
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