#myname
ना ठौर है ना ठहरा सा कोई ठिकाना
नाम का करे क्या ये अब्दुल्ला दीवाना,
ठाठ बाट का जो भी लगा है आज नजराना
एक ठोकर में ही है सब का यहां ढह जाना।
ठोक पीट के कहां सम्भव है मुकद्दर अपना बनाना,
समय का तो चरित्र है रंग बदलकर सबको ठगना,
उसे ना तो ठहरना है, ना ही किसी का ठौर ढूंढना
उसे तो बस सबको ठोकर मार आगे निकलना!
ढहना है ही जब सबको यहां ढलते हुए ख़ाक में,
उबरना है ही जब जीवन मरण के ढकोसले से,
निजाद पाना ही है जब इस हार मांस के ढांचे से,
फिर कैसी ढिठाई, कैसा इतराना अपने नाम पे!
ढीठ है ये अपना ढीला ढाला दिल दीवाना
चाहता है जो ढाल करने को वक्त का सामना,
ढलानों पर भी है उसे उतना ही ढाढस बांधना
जितना कि चढ़ते हुए पड़ा था उसे ढकेलना।
नाम है अनुपम मेरा, उसी का है सब फेरा
पूछते हैं सब नाम से मेरे, है तू पुरुष या महिला!
कई हंसे, कइयों ने प्रेमवश नाम का मर्म समझा
पर सबने नाम का मेरे अलग ही अर्थ निकाला,
किसी के लिए ये नाम प्रेम का स्त्रोत बना,
किसी के लिए निंदा का प्रमुख पर्याय बना,
कुछ अपनों ने अनुपम को बस अनुपम ही माना,
उसके भीतर बाहर के हर रस रंग को पहचाना!
ये शरीर नश्वर तो ढह जायेगा, ये ठिकाना अपना छूट जायेगा
रह जायेगा तो बस ये नाम, जो प्रेम संग अमर हो जायेगा!
©अनुपम मिश्र
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