शनिवार, 5 दिसंबर 2020

इश्क़

#love #इश्क़

अग्नि में निखरता लाह सा है इश्क
खुले रेत में पनाह सा है इश्क़,
सांसों के उतार चढ़ाव सा है इश्क़,
दिल के उलझे तार सा है इश्क़,
मदिरा से भी नशीला है इश्क़,
किसी भी रस से रसीला है इश्क़,
सागर से भी गहरा है इश्क़,
हर रंग से रंगीला है इश्क़,
कभी खोना, कभी पाना है इश्क़,
कभी कहना, कभी सुनना है इश्क़,
सोते से जगना, जगते से सोना है इश्क़,
कभी तड़पना, कभी सुलगना है इश्क़,
मन से मन का जुड़ना है इश्क़,
तन से तन का मिलना है इश्क़,
इश्क़ हवाओं में है, फिज़ाओं में है
सांसों में है इश्क़, धड़कन में इश्क़,
लबों पे है इश्क़, शब्दों में इश्क़,
इस इश्क़ के लिए एक जन्म तो क्या
अनंत जन्म भी कम है,
और इसका घुंट भर भी जो मिला
तो जीने को पर्याप्त है।

*व्यक्तिगत मत*
क्या रस्म और क्या धर्म
क्या नियम और क्या कर्म
सब लगते हैं बस भ्रम
जब इश्क़ का समझ आता मर्म!
पता है कि सागर में कूदें अगर
वाे लेकर अपनी गहराई में फिर
छोड़ देगा किनारे बेजान शरीर!
पता है कि खेले अगर अग्नि से
वो ग्राह अपना बनाकर हमे
राख भर का बचायेगा अवशेष!
पर जाने क्यूं
इस इश्क़ के सागर में
डूबने का डर नहीं,
इस इश्क़ की अग्नि में
जलने का डर नहीं,
डर नहीं कि क्या कहेगा जमाना
डर नहीं कि कैसे टूटेगा सपना
डर नहीं कि कौन छूटेगा अपना,
डर नहीं कि कहां होगा ठिकाना!
©अनुपम मिश्र

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