बुधवार, 9 दिसंबर 2020

अभ्युदय

अभ्युदय है दिप्त प्रकाश का
छाव सा है वृहत आकाश का,
ओज़ पूर्ण है सौम्य आवाज जिसका,
अचल शिखर सा है मिजाज़ जिसका,
रास्ता वो स्वयं अपना बनाता है,
धीरज से हर प्रहार का उत्तर देता है!

बिछा जाए जो कोई नुकीला शूल या नरम फूल,
ये ना डरते हैं ना रुकते है पाकर सब अनुकूल,
विकास के पथ पर पग बढ़ाते हुए समयानुकूल,
ये दोनों हाथों से करते हैं हर स्थिति को कुबूल,
धूल का कण कण इनका साथ निभाता है,
रूपरेखा इनके सपनों की वही बनाता बिगाड़ता है।

ज्ञान की कहां कोई सीमा होती है यहां
हैं असल ज्ञानी वो, जो जानते सब की जुबां,
जो सुनते स्वरों को बिन बदले उनका निशान,
जो कहते कुछ नहीं पर मौन में दिखा जाते जहां,
अक्श इनका हर सख्श के मन को लुभाता है,
इनका मन भी भंवरे की भाति हर रस को चखता है।

हां, ये भी कोई आम सख्श ही है
बस इसकी सोच सामान्य नहीं है
क्योंकि ये स्वयं को भी स्पष्ट नहीं है।
©अनुपम मिश्र

नाम

#myname

ना ठौर है ना ठहरा सा कोई ठिकाना
नाम का करे क्या ये अब्दुल्ला दीवाना,
ठाठ बाट का जो भी लगा है आज नजराना
एक ठोकर में ही है सब का यहां ढह जाना।
ठोक पीट के कहां सम्भव है मुकद्दर अपना बनाना,
समय का तो चरित्र है रंग बदलकर सबको ठगना,
उसे ना तो ठहरना है, ना ही किसी का ठौर ढूंढना
उसे तो बस सबको ठोकर मार आगे निकलना!

ढहना है ही जब सबको यहां ढलते हुए ख़ाक में,
उबरना है ही जब जीवन मरण के ढकोसले से,
निजाद पाना ही है जब इस हार मांस के ढांचे से,
फिर कैसी ढिठाई, कैसा इतराना अपने नाम पे!
ढीठ है ये अपना ढीला ढाला दिल दीवाना
चाहता है जो ढाल करने को वक्त का सामना,
ढलानों पर भी है उसे उतना ही ढाढस बांधना
जितना कि चढ़ते हुए पड़ा था उसे ढकेलना।

नाम है अनुपम मेरा, उसी का है सब फेरा
पूछते हैं सब नाम से मेरे, है तू पुरुष या महिला!
कई हंसे, कइयों ने प्रेमवश नाम का मर्म समझा
पर सबने नाम का मेरे अलग ही अर्थ निकाला,
किसी के लिए ये नाम प्रेम का स्त्रोत बना,
किसी के लिए निंदा का प्रमुख पर्याय बना,
कुछ अपनों ने अनुपम को बस अनुपम ही माना,
उसके भीतर बाहर के हर रस रंग को पहचाना!

ये शरीर नश्वर तो ढह जायेगा, ये ठिकाना अपना छूट जायेगा
रह जायेगा तो बस ये नाम, जो प्रेम संग अमर हो जायेगा!
©अनुपम मिश्र

शनिवार, 5 दिसंबर 2020

इश्क़

#love #इश्क़

अग्नि में निखरता लाह सा है इश्क
खुले रेत में पनाह सा है इश्क़,
सांसों के उतार चढ़ाव सा है इश्क़,
दिल के उलझे तार सा है इश्क़,
मदिरा से भी नशीला है इश्क़,
किसी भी रस से रसीला है इश्क़,
सागर से भी गहरा है इश्क़,
हर रंग से रंगीला है इश्क़,
कभी खोना, कभी पाना है इश्क़,
कभी कहना, कभी सुनना है इश्क़,
सोते से जगना, जगते से सोना है इश्क़,
कभी तड़पना, कभी सुलगना है इश्क़,
मन से मन का जुड़ना है इश्क़,
तन से तन का मिलना है इश्क़,
इश्क़ हवाओं में है, फिज़ाओं में है
सांसों में है इश्क़, धड़कन में इश्क़,
लबों पे है इश्क़, शब्दों में इश्क़,
इस इश्क़ के लिए एक जन्म तो क्या
अनंत जन्म भी कम है,
और इसका घुंट भर भी जो मिला
तो जीने को पर्याप्त है।

*व्यक्तिगत मत*
क्या रस्म और क्या धर्म
क्या नियम और क्या कर्म
सब लगते हैं बस भ्रम
जब इश्क़ का समझ आता मर्म!
पता है कि सागर में कूदें अगर
वाे लेकर अपनी गहराई में फिर
छोड़ देगा किनारे बेजान शरीर!
पता है कि खेले अगर अग्नि से
वो ग्राह अपना बनाकर हमे
राख भर का बचायेगा अवशेष!
पर जाने क्यूं
इस इश्क़ के सागर में
डूबने का डर नहीं,
इस इश्क़ की अग्नि में
जलने का डर नहीं,
डर नहीं कि क्या कहेगा जमाना
डर नहीं कि कैसे टूटेगा सपना
डर नहीं कि कौन छूटेगा अपना,
डर नहीं कि कहां होगा ठिकाना!
©अनुपम मिश्र

बुधवार, 2 दिसंबर 2020

अश्रु

क्या बांधना उस बांध को
जिसका टूटना तय है!
क्या समेटना उस तरंग को
जिसका बहना तय है!
ये जो टूट कर बहता है आंखों से
उसका अपना ताल व लय है,
जिसके गालों पे थिडकने से
सुकून का मिलना तय है।
ये कोई रोग नहीं, कोई विकार नहीं,
बस प्रवाह है हृदय में उमड़ते भावों का,
कभी गमगीन पलों का, कभी उमंगों का,
इसके बहने से होता कोई कमज़ोर नहीं।

जाने क्यों इसे लोग दुख का पर्याय मानते हैं
जबकि ये सुख दुख दोनों में साथ देता है,
जाने क्यों इसे देखते ही लोग मान लेते हैं
कि अश्रु बहाने वाला बहुत ही हलका होता है!
अश्रु का जल स्त्रोत तो वो भाव का बदरा है
जो अंतःकरण को निर्मल कर देता है
आंखों को तो स्वच्छ करता ही है
साथ में आत्मा को तृप्त कर देता है।
ना रोको इन तरंगों के बांध को
ना मापों तुम इनके प्रवाह के मान को
छलक जाने दो इन्हें दो नैनों से
इनका यूं बहते जाना तो तय है।
©अनुपम मिश्र

’हमने देखी है ' के तर्ज पर

"हम ने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू
हाथ से छूके इसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो
हम ने देखी है ..."

हम ने सीखी है इस ज़माने से जुनूनी ज़ुस्तज़ू
तड़प कह के इसे कहीं तुम नीलाम न कर दो
जाना बहुत दूर है आगे, हमे मजबूर न करो
जूनून के आग को जलने दो, आगे बढ़ने दो,
हम ने सीखी है इस ज़माने से जुनूनी ज़ुस्तज़ू।

जूनून कुछ पाने की नहीं, जूनून साज़ नहीं,
एक कोशिश है जो न रुकती है न थकती है,
ना ये डरती है ना डराती है ना सहमती है कहीं
एक सुकून सी सांस साथ चलती है
सांस है जब तक, इसे दिल से मंजूर करो
जूनून के आग को जलने दो, आगे बढ़ने दो,
हम ने सीखी है इस ज़माने से जुनूनी ज़ुस्तज़ू।

ताजगी की तरंगें बहती हैं, किसी का डर नहीं
पथ के पत्थरों- कांटों - शूलों को पार करते हैं
पैर जवाब देते नहीं, रक्त चिह्न बन जाते हैं मगर
दर्द नहीं होता इन्हें, बस ये पथ पर चलते रहते हैं
जाना बहुत दूर है आगे, हमे मजबूर न करो
जूनून के आग को जलने दो, आगे बढ़ने दो,
हम ने सीखी है इस ज़माने से जुनूनी ज़ुस्तज़ू।
©अनुपम मिश्र 

अभ्युदय

अभ्युदय है दिप्त प्रकाश का छाव सा है वृहत आकाश का, ओज़ पूर्ण है सौम्य आवाज जिसका, अचल शिखर सा है मिजाज़ जिसका, रास्ता वो स्वयं अपना बनाता है...