बुधवार, 2 दिसंबर 2020

’हमने देखी है ' के तर्ज पर

"हम ने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू
हाथ से छूके इसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो
हम ने देखी है ..."

हम ने सीखी है इस ज़माने से जुनूनी ज़ुस्तज़ू
तड़प कह के इसे कहीं तुम नीलाम न कर दो
जाना बहुत दूर है आगे, हमे मजबूर न करो
जूनून के आग को जलने दो, आगे बढ़ने दो,
हम ने सीखी है इस ज़माने से जुनूनी ज़ुस्तज़ू।

जूनून कुछ पाने की नहीं, जूनून साज़ नहीं,
एक कोशिश है जो न रुकती है न थकती है,
ना ये डरती है ना डराती है ना सहमती है कहीं
एक सुकून सी सांस साथ चलती है
सांस है जब तक, इसे दिल से मंजूर करो
जूनून के आग को जलने दो, आगे बढ़ने दो,
हम ने सीखी है इस ज़माने से जुनूनी ज़ुस्तज़ू।

ताजगी की तरंगें बहती हैं, किसी का डर नहीं
पथ के पत्थरों- कांटों - शूलों को पार करते हैं
पैर जवाब देते नहीं, रक्त चिह्न बन जाते हैं मगर
दर्द नहीं होता इन्हें, बस ये पथ पर चलते रहते हैं
जाना बहुत दूर है आगे, हमे मजबूर न करो
जूनून के आग को जलने दो, आगे बढ़ने दो,
हम ने सीखी है इस ज़माने से जुनूनी ज़ुस्तज़ू।
©अनुपम मिश्र 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

अभ्युदय

अभ्युदय है दिप्त प्रकाश का छाव सा है वृहत आकाश का, ओज़ पूर्ण है सौम्य आवाज जिसका, अचल शिखर सा है मिजाज़ जिसका, रास्ता वो स्वयं अपना बनाता है...