क्या बांधना उस बांध को
जिसका टूटना तय है!
क्या समेटना उस तरंग को
जिसका बहना तय है!
ये जो टूट कर बहता है आंखों से
उसका अपना ताल व लय है,
जिसके गालों पे थिडकने से
सुकून का मिलना तय है।
ये कोई रोग नहीं, कोई विकार नहीं,
बस प्रवाह है हृदय में उमड़ते भावों का,
कभी गमगीन पलों का, कभी उमंगों का,
इसके बहने से होता कोई कमज़ोर नहीं।
जाने क्यों इसे लोग दुख का पर्याय मानते हैं
जबकि ये सुख दुख दोनों में साथ देता है,
जाने क्यों इसे देखते ही लोग मान लेते हैं
कि अश्रु बहाने वाला बहुत ही हलका होता है!
अश्रु का जल स्त्रोत तो वो भाव का बदरा है
जो अंतःकरण को निर्मल कर देता है
आंखों को तो स्वच्छ करता ही है
साथ में आत्मा को तृप्त कर देता है।
ना रोको इन तरंगों के बांध को
ना मापों तुम इनके प्रवाह के मान को
छलक जाने दो इन्हें दो नैनों से
इनका यूं बहते जाना तो तय है।
©अनुपम मिश्र
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