मेरी विकलांगता पर खुल के हंसते हैं
और अपनी कमी को दिन रात रोते हैं;
गिर पड़ी जब ठोकर खाकर पत्थर से
अंधा बताकर हमे मज़े लेते रहे खूब वे
पर जब खुद अंधे हुए धूल में चलने से
अपने आप को गमगीन बेचारा बताते रहे।
©अनुपम मिश्र
अभ्युदय है दिप्त प्रकाश का छाव सा है वृहत आकाश का, ओज़ पूर्ण है सौम्य आवाज जिसका, अचल शिखर सा है मिजाज़ जिसका, रास्ता वो स्वयं अपना बनाता है...
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